भारत के विज्ञापन-विश्व में एक युग समाप्त हुआ जब विज्ञापन गुरु पियूष पांडे ने हमें अलविदा कहा। उन्होंने सिर्फ ब्रांड्स के लिए विज्ञापन नहीं बनाए, बल्कि भारतीय ब्रांडिंग की भाषा ही बदल दी।
जयपुर में जन्मे पांडे ने शुरुआत में पेशेवर जीवन में कई काम आज़माए — चाय स्वाद-परखना, क्रिकेट खेलना — लेकिन बाद में उन्होंने विज्ञापन जगत में कदम रखा।1982 में उन्होंने प्रवेश किया और बाद में Ogilvy India के लिए ऐसे कैंपेन बनाए जो लोगों की जुबान पर उतर गए।
उनके द्वारा बनाए गए कुछ अमर कैंपेन में शामिल हैं: “अब की बार, मोदी सरकार” (Ab ki baar Modi sarkar) , “कुछ खास है” (कैडबरी), “हर ख़ुशी में रंग लाए” (एशियन पेंट्स) — ये सिर्फ विज्ञापन नहीं बल्कि भारतीय-संस्कृति में जड़ें जमा चुके टैगलाइन बन गए।
पांडे को 2016 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, और 2024 में उन्हें LIA Legend Award भी मिला था — यह उनकी क्रिएटिव यात्रा का प्रमाण है।
उनके निधन से विज्ञापन क्रिएटिव्स, ब्रांड रणनीतिकार, और आम दर्शक सभी ठहरे — क्योंकि उन्होंने विज्ञापन को सिर्फ “बेचना” नहीं माना, बल्कि “संवाद करना” माना। उनके द्वारा स्थापित मानदंड आज भी कई ब्रांड्स और क्रिएटिव इंसानों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।
उनका जाना न सिर्फ एक व्यक्ति का जाना है — बल्कि उस ‘भावना’ का जाना है जिसने भारतीय विज्ञापन-भूमि को नए आयाम दिए।
